Hindu Today’s Editorial Hindi Analysis

indu Today's Editorial Hindi

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Life and Livelihood जीवन और रोजी रोटी

द हिंदू का आज का एडिटोरियल कोविड-19 से होने वाले आर्थिक नुकसान और जीवन पर प्रकाश डालता है l एडिटोरियल अपने हवाले से लिखता है सरकार के पास दो रास्ते है l लॉक डाउन को आगे बढ़ाकर नागरिकों की जीवन की सुरक्षा करें या फिर लॉक डाउन समाप्त करके चरणबद्ध तरीके से आर्थिक गतिविधियों को प्रारंभ करें l

सरकार ने जिस प्रकार से निर्णय लिए वैसे समय में यह आवश्यक भी था l  अब यह आवश्यक है कि सरकार कुछ ऐसे आर्थिक और बड़े कदम उठाएं जिससे अर्थव्यवस्था दोबारा से पटरी पर लाया जा सके l  सरकार से आशा की जाती है कि कुछ ऐसे आर्थिक फैसले लिए जाएं जो आउट ऑफ बॉक्स अर्थात जो हटकर हो l

मध्यम लघु और सूक्ष्म उद्योगों पर COVID-19 का प्रभाव : Hindu Today’s Editorial Analysis

द हिन्दू एडिटोरियल (The Hindu Editorial) अपने हवाले से लिखता है आर्थिक गतिविधि न होने पर और आय में कमी होने पर मध्यम एवं लघु उद्योग को बहुत बड़ा झटका लगा है l जिसके कारण इसमें कार्यरत करोड़ों रोजगार समाप्त हो गए हैं l ऐसी शंका जताई जा रही है यदि आर्थिक अवरोध बना रहा तो बहुत जल्द लोग भूख से भी मरने लगेंगे l

 हालांकि Hindu Today’s Editorial Hindi एडिटोरियल वित्त मंत्री सीतारमण के 1.7 करोड़ रुपए के सहायता को अच्छा मानता है l लेकिन यह राशि बहुत कम हैl  विकसित देशों ने अपनी जीडीपी का लगभग 10 से 15% तक अपनी अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने के लिए खर्च किया हैl  वहीं पर भारत ने सिर्फ अपनी अर्थव्यवस्था का लगभग 1% के बराबर खर्च किया हैं l Hindu Today’s Editorial Hindi Analysis के प्रत्येक दिन के एनालिसिस प्राप्त करने के लिए चैनल को सब्सक्राइब करे l

The hindu editorial hindi analysis
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आर्थिक मंदी दूर करने के उपाय

अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए भारत सरकार को एक बड़ा आर्थिक पैकेज देने की जरूरत है l एडिटोरियल कहता है कि सरकार को अधिक राजस्व खर्च करना चाहिएl  इसका सबसे अच्छा उदाहरण मलेशिया का ले सकते हैं जिसने अपनी सकल घरेलु उत्पाद का लगभग 18% अपने नागरिकों को खर्च करने के लिए दिया है l

विशेषज्ञों की राय है कि सरकार को रूढ़ीवादी उपायों को छोड़कर कुछ अलग तरह के आर्थिक प्रयास करने होंगे l जिससे अर्थव्यवस्था में गति आ सके और मांग तथा उत्पादन में वृद्धि हो l अभी तक भारत ने 1.70 लाख करोड़ रुपए खर्च किये है जो भारत की अर्थव्यवस्था का लगभग 1% है l

कुछ सुझाव भी देता है जो इस प्रकार हैं :

  1. गरीब जनता को लगभग ₹3000 प्रतिमाह दिए जाएं अभी सरकार ने ₹500 प्रतिमाह दिए हैं l
  2.  किसानों का लॉक डाउन के कारण बहुत बड़ा नुकसान हुआ है l वह अपने अनाज को बाजार तक नहीं ले जा पा रहे l  जिसके कारण उनके पास आय का कोई साधन नहीं रह गया है l  यह जरूरी है कि किसानों के लिए लॉजिस्टिक सपोर्ट मुहैया करवाया जाए
  3.  कर्जदार को अपना कर्ज चुकाने के लिए एक लंबी अवधि दी जानी चाहिए l
  4.  उपभोक्ता के पास आय के साधन न होने के कारण वह अपनी मासिक किस्त नहीं चुका पाता है l

विशेषज्ञों की राय

विशेषज्ञों की राय में माध्यम, लघु एवं सूक्ष्म उद्योग (Ministry of Micro Small and Medium Enterprises(MSME)) के अंतर्गत आने वाले सभी उद्योगों को कम से कम 6 माह का समय दिया जाए l  msme  के अंतर्गत आने वाले सभी उद्योगों के ऋण की समय सीमा को कम से कम 6 महीने तक बढ़ा दिया जाए l

मध्यम लघु एवं सूक्ष्म उद्योग में देश की बहुत बड़ी जनसंख्या कार्यरत है l इस उद्योग के ठप पड़ने के कारण एक बहुत बड़ी जनसंख्या के पास आय के साधन समाप्त हो गए हैं l इसलिए यह जरूरी है कि मध्यम एवं लघु उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कुछ बड़े कदम सरकार के द्वारा उठाए जाने चाहिए l

The hindu editorial hindi analysis
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GST Holiday करो में छूट

The Hindu Today’s Editorial Analysis में एडिटोरियल यह भी सुझाव देता है कि जीएसटी हॉलिडे(GST Holiday ) कम से कम 3 महीने के लिए लगाया जाना चाहिए l GST Holiday का अर्थ होता है एक निश्चित सीम के लिए करों में भारी छूट देना या माफ़ कर देना l

विशेषज्ञों का मानना है सरकार को कोविड-19 संकट से उबरने के लिए कुछ अलग प्रकार के आर्थिक कदम उठाने की आवश्यकता है l जिस प्रकार से अब तक फैसले लिए गए हैं उससे ऐसा कम ही जान पड़ता है कि अर्थव्यवस्था दोबारा से पटरी पर आएगी l The Hindu Full News

विकसित देशों के द्वारा किये जाने वाले उपाय :

सरकार को दूसरे देशों जैसे अमेरिका जर्मनी ब्रिटेन से कुछ सीखना चाहिए l  विकसित तथा विकासशील देश अपनी अर्थव्यवस्था को कोविड-19 संकट से होने वाले नुकसान को से उबारने के लिए अपनी अर्थव्यवस्था का लगभग 10 से 15% तक राजस्व खर्च कर रहे हैं l

 इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि सरकार को इस बार कुछ क्रांतिकारी फैसले लेने होंगे l अपने रूढ़िवादी फैसलों को छोड़कर कुछ ऐसे निर्णय करने होंगे, ऐसे बड़े बदलाव करने होंगे जिससे आर्थिक गतिविधि आर्थिक प्रक्रिया दोबारा से अपनी रफ्तार पकड़ ले l देश आर्थिक संकट से जल्द से जल्द उबर सके l

आज का द हिन्दू एडिटोरियल(The Hindu Editorial) देश की जीडीपी और राजस्व घाटे पर प्रकाश डालता है l आइए जीडीपी और राजकोषीय घाटे के बारे में कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों पर  चर्चा करते हैं

 सकल घरेलू उत्पाद (GDP)

किसी राष्ट्र के द्वारा 1 वर्ष में कुल वस्तुओं एवं सेवाओं के उत्पादन को सकल घरेलू उत्पाद कहा जाता है l द हिन्दू एडिटोरियल(The Hindu Editorial)

किसी राष्ट्र के द्वारा एक निश्चित समय सीमा के अंतर्गत उत्पादित अंतिम वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य को सकल घरेलू उत्पाद अर्थात जीडीपी(GDP ) कहा जाता है l साधारणतया इसकी सीमा 1 वर्ष होती  हैं l  सकल घरेलू उत्पाद का संबंध खर्च उत्पादन और आय से होता है

The Hindu Editorial Hindi Analysis

लोगों में अधिक खर्च करने की क्षमता होने के कारण उत्पादन में वृद्धि होती है l Hindu Today’s Editorial Hindi Analysis के तहत आप को प्रत्येक दिन के एडिटोरियल का हिंदी एनालिसिस मिलती है l

उत्पादन में वृद्धि होने के कारण अर्थव्यवस्था में गतिशीलता बढ़ती है l खर्च और उत्पादन बढ़ने के कारण आय में वृद्धि होती है l किसी भी राष्ट्र की जीडीपी खर्च उत्पादन और आय में वृद्धि के साथ साथ वृद्धि करती हैं l

The Hindu Today's Editorial
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सकल घरेलु उत्पादन में भारत का स्थान

सकल घरेलू उत्पादन एक ऐसा पैमाना है जिसके द्वारा किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था को नापा जाता है सकल घरेलू उत्पादन के आधार पर भारत को विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त है l

 भारत के अलावा

  1. अमेरिका(21.44 ट्रिलियन )
  2. चीन(14.14 ट्रिलियन )
  3. जापान(5.15 ट्रिलियन )
  4. जर्मनी(3.86 ट्रिलियन )
  5. भारत की अर्थव्यवस्था 2.94 ट्रिलियन की है l

 राजकोषीय घाटा(Fiscal Deficit )

सरकार का आय से अधिक खर्च करने की प्रक्रिया को राजकोषीय घाटा कहा जाता है इसको इस प्रकार से समझा जा सकता है यदि सरकार की आय ₹100 है और सरकार ने ₹105 खर्च किए हैं तो इस प्रकार से सरकार का खर्च अपनी आय से ₹5 अधिक है l  इसका यह मतलब हुआ कि सरकार को 5% राजकोषीय घाटा हुआ है

 बाजार में मांग बढ़ाने के लिए सरकार अपने राजस्व का एक बहुत बड़ा भाग नागरिकों पर खर्च कर सकती है l  यह बहुत ही सूक्ष्म और कम समय के लिए उपाय माने जाते हैं l इसमें अर्थव्यवस्था में गतिविधि और क्रियाकलाप बढ़ जाते हैं परंतु वह बहुत ही सीमित समय के लिए होते हैं l राजकोषीय घाटे को अर्थव्यवस्था के लिए लंबे समय के लिए सही नहीं माना जाता है l

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