संविधान का निर्माण कक्षा 12 इतिहास नोट्स making of constitution class 12 history notes in hindi


संविधान का निर्माण 




कक्षा 12 इतिहास नोट्स  


Making of constitution 


class 12 history notes in hindi 

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संविधान सभा का गठन 

  1. संविधान सभा का गठन सन 1946 में किया गया l संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन के आधार पर किया गया था l 
  2. संविधान सभा में कुल मिलाकर 389 सदस्य थे जिनका चुनाव सांप्रदायिक आधार पर किया गया था l
  3. प्रत्येक सदस्य का चुनाव लगभग 10 लाख आबादी की संख्या पर किया गया था l 
  4. 9 दिसम्बर 1946 को दिल्ली के काउन्सिल चैंबर के पुस्तकालय में पहली बार संविधान सभा की बैठक हुई l मुस्लिम लीग ने बैठक का बहिष्कार करते हुए पाकिस्तान के लिए बिलकुल अलग संविधान सभा की मांग की l 
  5. 11 दिसंबर 1946 को डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को संविधान सभा का स्थाई अध्यक्ष चुना गया l 
  6. डॉक्टर सच्चितानंद सबसे बुजुर्ग संविधान सभा सदस्य थे जो संविधान सभा के अस्थायी अध्यक्ष थे l 
  7. 13 दिसम्बर 1946 को पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संविधान की उद्देश्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया और संविधान निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी l 
  8. 29 अगस्त 1947 में डा. भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में प्रारूप समिति का गठन किया गया l प्रारूप समिति में कुल मिलाकर 7 सदस्य थे l 
  9. प्रारूप समिति में कुल मिलाकर 7 सदस्य थे जो निम्नलिखित है :  
1 डा. भीमराव आंबेडकर
2 एन गोपालस्वामी आयंगर
3 अल्लादी कृष्णास्वामी आयर
4 कन्हैयालाल मानिकलाल मुंशी
5 सैयद मोहम्मद सादुल्ला
6 एन माधव राव
7 डी पी खेतान की मृत्यु के पश्चात टी टी कृष्णामचारी
 

10. 31 अक्टूबर 1947 को संविधान सभा का दुबारा से गठन किया गया और अब संविधान सभा में कुल मिलाकर 299 सदस्य थे जिसमे ब्रिटिश इंडिया के  और देशी रियासतों के 70 सदस्य थे l 

अधिकारों का निर्धारण 

  1. संविधान सभा के सामने गरीबों, वंचितों और दमितो पर अधिकारों के निर्धारण को लेकर बहुत उठा पटक चल रही थी l 
  2. अल्पसंख्यक समुदाय के अधिकारों के निर्धारण को लेकर भी संविधान सभा में काफी बहस और गहन विचार चर्चा हुई l 
  3. अल्पसंख्यक समुदाय के पक्ष में बी. पोकर बहादुर ने पृथक निर्वाचक मंडल की मांग की l
  4. सरदार बल्लभभाई पटेल और गोविंद बल्लभ पन्त ने इसे देश की शांति और भाई चारे के लिए खतरा माना l इसलिए पृथक निर्वाचक व्यवस्था को नही अपनाया गया l 
  5. हर समुदाय ने अपने लिए कुछ विशेश अधिकारों के मांग की जैसे किसानों के नेता एन.जी.रंगा ने अल्पसंख्यक की परिभाषा आर्थिक आधार पर की l उन्होंने गरीब और दबे कुचले लोगो को अल्पसंख्यक के रूप में परिभाषित करने को कहा l 
  6. जयपाल सिंह जैसे आदिवासी नेता ने आदिवासियों के हित की बात उठाई l उन्होंने संविधान सभा को आदिवासियों पर शदियों होने वाले भेदभाव और छुआछुत की और ध्यान आकर्षित कराया l 
  7. सबसे ज्यादा विचार विमर्श दलितों और हरिजनों के अधिकारों की हुई जिनकी आबादी देश की कुल आबादी का 20-25 प्रतिशत थी l परन्तु फिर भी समाज ने इन दमितो को हासिये पर रखा l 
  8. सवर्ण बहुमत वाली संविधान सभा में कई नेताओं ने हजारों वर्षो से दबाई जाने वाले दमितो और आदिवासियों पर बहुत अच्छा भाषण देते हुए उन्हें समाज में बराबरी और सम्मान देने की मांग की l  

संविधान सभा में भाषण देने वाले कुछ प्रमुख नेता 

पंडित जवाहरलाल नेहरू :

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में संविधान निर्माण के उद्देश्य रखे जिसे उद्देश्य प्रस्ताव के नाम से जाना गया l उद्देश्य प्रस्ताव से यह पता चलना था की भारतीय संविधान कैसा होगा l उन्होंने संविधान में “जनता के इच्छा” और जनता के दिलों में समायी आकांक्षाओं और भावनाओं” आदि का भाव प्रस्तुत किया l

बी पोकर बहादुर 

27 अगस्त 1947 को मद्रास के बी पोकर बहादुर ने पृथक निर्वाचिका को बनाये रखने पर बहुत ही प्रभावशाली भाषण दिया था l उन्होंने अल्पसंख्यको के अधिकारों और उनके प्रतिनिधित्व को सुरक्षित करने के लिए पृथक निर्वाचिका की मांग की l उनके अनुसार मुसलमानों को ऐसे अधिकार मिले जिससे वे औरो के साथ सद्भाव अरु सौहार्द भरा जीवन जी सके l इसके लिए पृथक निर्वाचिका के आलावा और कोई प्रतिनिधित्व हो ही नहीं सकता है l

आर. वी. धुलेकर 

आर. वी. धुलेकर ने अल्पसंख्यकों खासतौर से मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचिका का विरोध किया l उनके अनुसार ” अंग्रेजों ने संरक्षण के नाम पर चाल चली l इसकी आड़ में उन्होंने अल्पसंख्यकों को फुसला लिया है l अब इस आदत को छोड़ दो ” अब तुम्हे बहकाने वाला कोई नहीं है l

सरदार पटेल 

सरदार पटेल ने भी पृथक निर्वाचिका का विरोध किया उनके अनुसार “पृथक निर्वाचिका का एक ऐसा विष है जो हमारे देश की पूरी राजनीती में समा चूका है l “
पटेल ने कहा ” क्या तुम इस देश में शांति चाहते हो ? अगर चाहते हो तो इसे (पृथक निर्वाचिका) को फ़ौरन छोड़ दो l”

गोविन्द बल्लभपन्त 

उन्होंने ऐलान किया की पृथक निर्वाचिका देश के लिए तो खतरा है ही साथ साथ यह अल्पसंख्यको के लिए भी बहुत बड़ा खतरा है l उनके अनुसार एक मुक्त देश में प्रत्येक नागरिक के साथ ऐसा आचरण किया जाना चाहिए जिससे “न केवल उसकी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो बल्कि उसमे स्वाभिमान का अध्यात्मिक भाव भी पैदा हो” तथा बहुल समुदाय का यह दायित्व है की वह अल्पसंख्यकों की समस्याओं को समझे l



पन्त ने कहा की हमारे अन्दर यह आत्मघाती और अपमान जनक भावना बनी हुई है की हम कभी नागरिक के रूप में नहीं सोचते बल्कि समुदाय के रूप में ही सोचते है l हमारा सामाजिक पिरामिड का आधार भी और उसकी चोटी भी नागरिक ही होता है l 

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